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Wednesday, August 27, 2008

सिन्धु घाटी की सभ्यता ( Indus valley Civilisation )

भोगोलिक क्षेत्रफल : क्षेत्रफल 1299600 वर्ग कि. मी., आकार त्रिभुजाकार तथा इसके अंतर्गत पंजाब, सिंध, बलूचिस्तान, अफगानिस्तान, गुजरात, राजिस्थान, हरियाणा व उ. प्र. के कुछ भाग आते हैं। पूर्व से पश्चिम तक 1600 कि.मी. तथा उत्तर सेस दक्षिण तक 1100 कि.मी. तक विस्तार है।


सर्वप्रथम हड़प्पा नमक स्थल से जानकारी मिलने के कारण इसे "हड़प्पा" सभ्यता नाम दिया गया।
  • यह एक कांस्य युगीन सभ्यता है जिसे आद्य इतिहास के अंतर्गत मन जाता है।
  • हड़प्पा टीले का सर्वप्रथम उल्लेख 1826 . में चाल्र्समैसन ने किया था, परन्तु इस सभ्यता का रहस्योदघाटन1856 . में कराची और लाहौर के बीच रेल पटरी बिछाने के दौरान जॉनब्रंटन और विलियम ब्रंटन ने किया1922 . में मोहनजोदाडो की खुदाई के आधार पर 1924 . में भारतीय पुरातत्व विभाग के महानिदेशक जॉन मार्शल ने इस सभ्यता की घोषणा की
राजनीतिक स्थिति: कोई लिखित साक्ष्य न मिलने के कारन राजनीतिक स्थिति की ठीक जानकारी नहीं मिल पाती परन्तु पुरातात्त्विक साक्ष्यों के आधार पर हंटर महोदय ने यहाँ जनतांत्रिक व्यवस्था का अनुमान लगाया है।
  • प्रशासन में पुरोहित एवं वणिक वर्ग की महत्वपूर्ण भूमिका थी।
  • उत्तर में हड़प्पा एवं दक्षिण में मोहनजोदाडो दो राजधानियां भी थी।
सामाजिक स्थिति: सैन्धव समाज मातृ प्रधान था। नगरों के भग्नावेशों से पता चलता है कि शहरों के लोग विलासितापूर्ण जीवन जीते थे तथा भिन्न भिन्न वर्गों का अस्तित्व था। समाज में व्यापारी वर्ग सबसे प्रभावशाली था। कृषक, शिल्पकार, मजदूर, सामान्य लोग थे तथा चिकित्सक, पुरोहित, अधिकारी शिक्षित वर्ग थे।
  • हड़प्पा की श्रमिक बस्तियों के अवशेष यहाँ दास प्रथा का संकेत देते हैं।
  • शाकाहार तथा मांसाहार दोनों का प्रचलन था। गेहूं, जौ, खरबूज, तरबूज, नारियल, नीबूं, अनार, भेड़, बकरी, सूअर, मुर्गी, बत्तख, आदि का उल्लेख मिलता है।
  • सूती एवं उनी वस्त्रों का प्रयोग किया जाता था।
  • काजल, पाउडर, लिपिस्टिक, दर्पण आदि साक्ष्यों से इनके सौंदर्य प्रियता की जानकारी मिलती है ।
  • मनोरंजन के लिए नृत्य, संगीत, पासा, शिकार, मछली पकड़ना आदि से परिचित थे।
  • योद्धा वर्ग के अस्तित्व का साक्ष्य नहीं मिला हैदस्तकारों में कुम्हारों को समाज में विशेष स्थान प्राप्तथाहड़प्पा के दुर्ग के बाहर मिले सार्वजनिक अन्नागार के पास मिले घटिया प्रकार के आवासों से विदितहोता है किउनमे दास या मजदूर रहते होंगेकालीबंगा तथा लोथल से ऐसे आवास नहीं मिले हैं
आर्थिक स्थिति:
कृषि : सैन्धव लोगों का मुख्या पेशा कृषि कार्य था। गेंहू और जौ प्रमुख फसलें तथा मटर, सरसों, तिल, आदि अन्य फसलें थीं।
  • चावल का अवशेष लोथल एवं रंगपुर से मिला हैलोथल से आटा पीसने की चक्की मिली है
  • कृषि कार्य हेतु प्रस्तर एवं कांस्य औजारों का प्रयोग किया जाता था। कालीबंगा से जुते हुए खेत एवं बनवाली से मिटटी का हल जैसा खिलौना प्राप्त हुआ है
  • कपास की खेती सर्वप्रथम यहीं शुरू की गयी।
पशुपालन: पशुपालन भी महत्वपूर्ण पेशा था। बैल, भैंस, गाय, भेड़, बकरी, कुत्ते, गधे, खच्चर आदि जानवर पाले जाते थे। लोथल एवं रंगपुर से घोड़े की मूर्तियाँ तथा सुरकोतदा से घोड़े के अस्थिपंजर प्राप्त हुए हैं। परन्तु घोड़े पालने का स्पष्ट साक्ष्य नही मिला है। हाथी को पालतू बना लिया गया

उद्योग:
हड़प्पा सभ्यता का प्रमुख उद्योग सूती वस्त्र निर्माण था। मुद्रा निर्माण, मूर्ति निर्माण, आभूषण एवं मनके बनाने के साक्ष्य भी मिलते हैं। बर्तन निर्माण भी अत्यन्त महत्वपूर्ण व्यवसाय था।
विशाल इमारतों से राजगीरी का प्रमाण मिलता है। मोहनजोदारो से ईंट भट्टों के अवशेष मिले हैं। इस सभ्यता के लोगों को लोहे का ज्ञान नहीं था। नाव बनाने के साक्ष्य मिले हैं। धातुओं से लघु मूर्तियां बनाने के लिए मोम-सांचा विधि प्रचलित थी। वे तांबा में टिन मिलाकर कांस्य बनाना जानते थे।
मनका उद्योग के प्रमुख केन्द्र लोथल एवं चहुन्दरो थे।
व्यापार: देशी एवं विदेशी दोनों प्रकार के व्यवसाय उन्नत अवस्था में थे। व्यापार विनिमय प्रणाली पर आधारित थी तथा व्यापारिक सम्बन्ध राजस्थान, अफगानिस्तान, ईरान, एवं मध्य एशिया के साथ था। गुजरात से चावल, लोथल एवं सुरकोतदा से कपास अन्य क्षेत्रों में भेजे जाते थे। नगरों से आभूषण, औजार, मनका, कपड़े आदि अन्य क्षेत्रों में भेजे जाते थे।
  • तौल की इकाई 16 के अनुपात में थीं। बांटों की तौल का अनुपात 1, 2, 4, 8, 16, 32......... आदि था। मोहनजोदारो से सीप एवं लोथल से हाथी दांत का पैमाना मिला है।
  • देशी व्यापार के परिवहन का साधन बैलगाड़ी व पशु तथा विदेशी व्यापार मुख्यतः नौ परिवहन द्वारा होता था।
  • बंदरगाह या व्यापार तंत्र से जुड़े प्रमुख नगर थे- बालाकोट, डाबरकोट, सुत्कांगेडोर, सोत्काकोह, मंडीगाक, मालवान, भगतराव तथा प्रभासपाटन।
  • विदेशी व्यापार: मेसोपोटामिया और सैन्धव सभ्यता के विनिमय स्थल दिलमुन और माकन थे। दिलमुन संभवतः बहरीन द्वीप तथा माकन "ओमान" था। मेसोपोटामियाई वर्णित शहर "मेलुहा" सिंध क्षेत्र का प्राचीन नाम है।

साक्ष्य: मेसोपोटामियाई( ईराक) बस्तियों के साक्ष्य सैन्धव स्थलों में नहीं मिले हैं, जबकि वहां पर यहाँ के अनेक साक्ष्य मिले हैं। वहां से आयातित वस्तुएं थीं- ऊनी कपड़े, खुशबूदार तेल आदि। जल्दी नष्ट हो जाने वाली इन के कारण संभवतः इनके अवशेष सैन्धव नगरों से नहीं मिले हैं।
  • मोहनजोदारो तथा हड़प्पा से बेलनाकार फारस की मुद्राएँ, मोहनजोदारो से मानव एवं बाघ के लड़ाई के चित्र वाली मुहर तथा हड़प्पा से मानव एवं बैल युद्ध की क्रीट- कला से सम्बंधित चित्र वाली मुहर मिली है।
  • तेल अंगराब से ककुदमान वृषभ की आकृति वाले मिट्टी के टुकड़े, नाल सूसा से साँप को पकड़े गरुड़ का चित्र, तथा सुमेरिया के राजा गुंगूनुम को एक कीलाक्षर पट्टिका पर हड़प्पा संस्कृति के साक्ष्य मिले हैं .
  • समुद्री मार्ग लोथल में खम्बात की खाड़ी से अरब सागर होते हुए फारस की खाड़ी तथा अंत में फुरात नदी के आस-पास पहुँचता था ।
मुहरें तथा लिपि: आमतौर पर मुहरें चौकोर होती थीं। बेलनाकार, वृत्ताकार, आयताकार भी मिलती हैं। अधिकांश सेलखड़ी की बनीं थीं, परन्तु कुछ गोमेद, मिट्टी व नाचर्ट की भी बनी थीं












  • मुहरों पर सर्वाधिक चित्र एक सींग वाले सांड (वृषभ) की है। अन्य चित्रों में कुत्ते, भैंस, गैंडा, हिरन, बाघ, हाथी आदि हैं। कुत्ते का चित्रांकन सर्वाधिक हुआ है, लेकिन पक्षियों का चित्र नही मिला है। ऊँट का अंकन भी नही हुआ है। मानव एवं अर्ध मानव के चित्र मिले हैं।
  • लोथल एवं देशलपुर से तांबे की मुहरें मिली हैं। सिन्धु लेख अधिकांशतः मुहरों पर मिले हैं। मुहरों का उपयोग विदेशों में निर्यातित वस्तुओं के गाँठ पर मुहर लगाने के लिए जाता था।
  • लिपि भाव चित्रात्मक है तथा प्रत्येक अक्षर किसी ध्वनि भाव या वास्तु का सूचक है। यह क्रमशः दाईं ऑर से बाईं ऑर तथा बाईं ऑर से दाईं ऑर लिखी जाती थी, इस पद्दति को 'बोस्ट्रोफेदोन' कहा गया है। लिपि का सबसे ज्यादा चिन्ह 'U' आकार का तथा सबसे ज्यादा प्रचलित चिन्ह 'मछली' का है।
कला तथा शिल्प: लोग कलाकृतियों के निर्माण के लिए धातु एवं पत्थर का उपयोग करते थे। सबसे प्रसिद्ध कलाकृति है- मोहनजोदारो से प्राप्त नृत्य की मुद्रा में नग्न स्त्री की कांस्य प्रतिमा। अन्य प्रसिद्ध कलाकृतियाँ हैं- हड़प्पा एवं चन्हुदडो से प्राप्त कांसे की गाडियाँ, मोहनजोदारो से प्राप्त दाड़ी वाले सिर की पत्थर की मूर्ति (संभवतः पुजारी), स्वस्तिक चिन्ह, मोहनजोदारो से प्राप्त हाथी दांत पर मानव चित्र। पकी मिट्टी की मूर्तियाँ (टेरीकोटा) मिली हैं। सिंह का चित्रण या मूर्तियाँ नही मिली हैं। बर्तनों पर वनस्पति का चित्रांकन पशुओं की अपेक्षा ज्यादा है। मिट्टी के बर्तन में एकरूपता है। ये बर्तन सादे हैं और उन पर लाल पट्टी के साथ-साथ काले रंग की चित्रकारी मिलती है। बर्तनों पर मुद्रा के निशान भी हैं। जिससे ज्ञात होता है कि उन बर्तनों का व्यापार भी होता था।

नगर योजना: हड़प्पा संस्कृति एक नगरीय संस्कृति थी। इस संस्कृति कि महत्वपूर्ण विशेषता इसकी नगर योजना प्रणाली थी। इस सभ्यता के नगर विश्व के प्राचीनतम सुनियोजित नगर हैं।
सामान्यतः इस सभ्यता के नगर दो भागों में बंटे थे। ऊंचे टीले पर स्थित प्राचीर युक्त बस्ती नगर दुर्ग और इसके पश्चिमी ओर के आवासीय क्षेत्र निचला नगर होता था।
  • दुर्ग में शासक वर्ग के लोग रहते थे तथा निचले नगर में सामान्य लोग रहते थे।
  • भवन निर्माण में पक्की एवं कच्ची दोनों तरह कि ईंटों का प्रयोग होता था। भवन में सजावट में आदि का अभाव था।
  • ईंटों के निर्माण का निश्चित अनुपात था 4:2:1
  • प्रत्येक मकान में स्नानागार, कुएं एवं गंदे जल की निकासी के लिए नालियों का प्रबंध था।
  • सड़कें कच्ची थीं और प्रायः एक दुसरे को समकोण पर काटती थीं तथा नगर को आयताकार खंडों में विभक्त करतीं थीं।
  • मकानों के दरवाजे मध्य में न होकर एक किनारे पर होते थे।
  • हड़प्पा संस्कृति की जल निकास प्रणाली अद्वतीय थी। समकालीन किसी भी सभ्यता ने स्वास्थ्य और सफाई को इतना महत्व नही दिया, जितना कि हड़प्पा संस्कृति के लोगों ने दिया।
  • हड़प्पाई जुड़ाई के लिए मिट्टी के गारे तथा जिप्सम के मिश्रण दोनों का उपयोग करते थे।
  • इस सभ्यता के नगरों के भवन जाल की तरह विन्यस्त थे।
धार्मिक जीवन: हड़प्पा संस्कृति के लोग मानव, पशु तथा वृक्ष तीनों रूपों में भगवान की उपासना करते थे। हड़प्पा की धार्मिक और हिंदू धर्म की जानकारी लगभग समान है।
  • मातृदेवी की उपासना प्रमुख था। एक श्रंगी पशु का चित्र जो सबसे अधिक प्राप्त होता है शायद बहुत पवित्र पशु था।
  • मोहनजोदारो से प्राप्त पशुपति मुहर से पशुपति पूजा की जानकारी मिलती है।
  • लिंग पूजा के प्रचुर साक्ष्य मिले हैं। पत्थर पर योनी आकृतियों का अंकन भी हुआ है जिनकी पूजा जनन शक्ति के रूप में की जाती थी।
  • पूज्य पशुओं में कूबड़ वाला सांड तथा वृक्षों में पीपल महत्वपूर्ण थे।
  • मन्दिर के अवशेष नहीं मिले हैं।
  • लोथल एवं कालीबंगा से हवन कुंडों एवं यज्ञवेदियों के साक्ष्य मिले हैं जो कि अग्नि पूजा का प्रमाण देते हैं। मोहनजोदारो के विशाल स्नानागार को धार्मिक महत्व प्राप्त था। उसके पास बनी अन्य विशाल ईमारत शायद पुरोहित का मठ था।
  • लोग भूत-प्रेत, तंत्र-मंत्र में विश्वास करते थे। कई मुहरों में एक त्रिमुखी देवता जिसके सिर पर भैंस के सींग का मुकुट है, जो योगी कि मुद्रा में बैठा हुआ है। यह देवता बकरी, हाथी, शेर, तथा हिरण से घिरा हुआ है। इसे पशुपति शिव माना जाता है।

दाह संस्कार: शावाधान के मुख्यतः तीन तरीके प्रचलित थे।
  1. पूर्ण शावाधान: इसमें संपूर्ण शव को भूमि दफना दिया जाता था।
  2. आंशिक शावाधन: इसमें पशु-पक्षियों के खाने के बाद शेष बचे भाग को भूमि में दफना दिया जाता था।
  3. दाह संस्कार: इसमें शव को पूर्णतः जलाया जाता था।


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